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इस्लामी जन्नत की हकीकत, Islamic Heaven Exposed 


इस्लामी जन्नत की हकीकतआपको मालूम है कि जन्नत की हकीकत क्या है ?

विश्व के लगभग सभी धर्मों में स्वर्ग और न र्कके बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है.इन में सभी धर्मों की बातों में काफी समानता पायी जाती है.

लेकिन स्वर्ग या जन्नत के बारे में जो बातें लिखी गयी हैं वह सिर्फ पुरुषों को रिझाने वाली बातें लिखी गयी हैं.जैसे मरने के बाद जन्नत में खूबसूरत जवान हूरें मिलेंगी ,जो कभी बूढ़ी नहीं होंगी .उनकी उम्र हमेशा १४-१५ साल की रहेगी.जन्नत वाले किसी भी हूर से शारीरिक सम्बन्ध बना सकेंगे.कुरआन में एक और ख़ास बात बतायी गयी है कि जन्नत में हूरों के अलावा सुन्दर लडके भी होंगे ,जिन्हें गिलमा कहा गया है .

शायद ऐसा इसलिए कहा गया होगा कि अरब और ईरान में समलैंगिक सेक्स आम बात है. आज भी पाकिस्तान में पुरुष वेश्यावृत्ति होती है .

इसलिए अक्सर जन्नत के मजे लूटने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.लोगों ने जन्नत के लालच में दुनिया को जहन्नुम बना रखा है .इस जन्नत के लालच और जहन्नुम का दर दिखा कर सभी धर्म गुरुओं की दुकानें चल रही हैं .भोले भाले लोग जन्नत के लालच में मरान्ने मारने को तैयार हो जाते हैं ,यहाँ तक खुद आत्मघाती बम भी बन जाते हैं.

पाहिले शुरुआती दौर में तो मुसलमान हमलावर लोगों को तलवार के जोर पर मुसलमान बनाते थे.लेकिन जब खुद मुसलाम्मानों में आपस में युद्ध होने लगे तो मुआसलामानों के एक गिरोह इस्माइली लोगों ने नया रास्ता अख्तियार किया .जिस से बिना खून खराबा के आसानी से आसपास के लोगोंको मुसलमान बनाता जा सके.

नाजिरी इस्मायीलिओं के मुजाहिद और धर्म गुरु “हसन बिन सब्बाह “सन-१०९०–११२४ ने जब मिस्र में अपनी धार्मिक शिक्षा पुरीकर चकी तो वह सन १०८१ में इरान के इस्फ़हान शहर चला गया .और इरान के कजवीन प्रान्त में प्रचार करने लगा.वहां एक किला था जिसे अलामुंत कहा जाता है.यह किला तेहरान से १०० कि मी दूर,केस्पियन सागर के पास है .उस समय किले का मालिक सुलतान मालिक शाह था.उनदिनों चारों तरफ युद्ध होते रहते थे.कभी सल्जूकी कभी फातमी आपस में लड़ते थे.इसलिए सुलतान ने किले की रक्षा के लिए अलवीखानदान के एक व्यक्ती कमरुद्दीन खुराशाह को नियुक्त कर दिया था.उनदिन किला खाली पडा था..हसन बिन सब्बाह ने किला तीन हजार दीनार में खरीद लिया.

हसन को वह किला उपयोगी लगा ,क्यों कि किला सीरिया और तेहरान के मार्ग पर था .जिसपर काफिलों से व्यापार होता था.

किला एक सपाट फिसलन वाली पहाडी पर है .किले की ऊंचाई ८४० मीटर है .लेकिन वहां पानी के सोते हैं.किले की लम्बाई ४०० मीटर और चौडाई ३० मीटर है..इसके बाब हसन ने अपने लोगों और कुछ गाँव के लोगों के साथ मिलकर काफिले वालों से टेक्स लेना शुरू करदिया. इससे हसन को काफी दौलत मिली.उसके बाद हसन ने किले में तहखाने और सुरंगें भी बनवा लीं.जब किला हराभरा हो गया तो ,हसन ने किले में एक नकली जन्नत भी बनाली.जैसा कुरआन में कहा गया है,हसन आसपास के गाँव से अपने आदमियों द्वारा सुन्दर ,और कुंवारी जवान लडकियां उठावा लेताथा. और लड़किओं को अपनी जन्नत के तहखानों में कैद कर लेता था.हसन ने इस नकली जन्नत में एक नहर भी बनवाई थी ,जिसमे हमेशा शराब बहती रहती थी.किले वह सब सामान थे जो कुरआनमें जन्नत के बारे में लिखे हैं.

फिरजब हसन के लोग आसपास के गाँव में धर्म प्रचार करने जाते तो लोगों को विश्वास में लेकर उन्हें हशीस पिलाकर बेहोश कर देते थे.और जब लोग बेहोश हो जाते तो उनको उठाकर किले में ले जाते थे .उनसे कहते कि अल्लाह तुम से खुश है ,

अब तुम जन्नत में रहो.लोग कुछ दिनों तक यह नादान लोग खूब अय्याशी करते और समझते थे कि वे जन्नत में हैं.फिर कुछ दिनों मौजा मस्ती करवाने के बाद लोगों दोबारा हशीश पिलाकर वापिस गाँव छोड़ दिया जाता .एक बार जन्नत का चस्का लग जाने के बाद लोग फिर से जन्नत की इच्छा करने लगते तो ,उनसे कहा जाता कि अगर फिर से जन्नत में जाना चाहते हो तो हमारा हुक्म मानो .लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाते थे.ऐसे लोगों को हसिसीन कहा जाता है .मार्को पोलो ने इसका अपने विवरणों में उल्लेख किया है आज भी लोग जन्नत के लालच में निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं.

यह जन्नत बहुत समय तक बनी रही.जब हलाकू खान ने १५ दिसंबर १२५६ को इस किले पर हमला किया तो किले के सूबे दार ने बिना युद्ध के किला हलाकू के हवाले कर दिया.जब हलाकू किले के अन्दर गया तो देखा वहां सिर्फ अधनंगी औरतें ही थी.हलाकू ने उन लडाकिन से पूछा तुम कौन हो ,तो वह वह बोलीं “अना मलाकुन”यानी हम हूरें हैं

यह किला आज भी सीरिया और ईरान की सीमा के पास है .सन २००४ के भूकंप में किले को थोडासा नुकसान हो गया .लेकिन आज बी लोग इस किले को देखने जाते हैं .और जन्नत की हकीकत समाज जाते हैं कि जैसे यह जन्नत झूठी है वैसे ही कुरआन में बतायी गयी जन्नत भी झूठ होगी

यह लेख पाकिस्तान से प्रकाशित पुस्तक “इस्माईली मुशाहीर “के आधार पर लिखा गया है.

प्रकाशक अब्बासी लीथो आर्ट .लयाकत रोड -कराची

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3 Responses

  1. Part 2-
    Research for BBC2’s Newsnight in November 2005 showed British Pakistanis accounted for 3.4 per cent of all births but have 30 per cent of all British children with recessive disorders.
    The comments are likely to intensify the debate about multi-culturalism in Britain, sparked last week by claims by the Archbishop of Canterbury that the introduction of sharia law in Britain is ‘inevitable’.
    Pressure mounted on Dr Rowan Williams today as Cardinal Cormac Murphy-O’Connor, the leader of the Roman Catholic Church in England and Wales, insisted that migrants must obey the British legal system.
    —-
    Inbreeding, Incest and Cousin Marriage in Islam

    Muslim inbreeding is causing a massive surge in birth defects:
    http://www.dailymail.co.uk/news/article-513388/Minister-Muslim-inbreeding-Britain-causing-massive-surge-birth-defects.html

    Phil Woolas, an environment minister, said the culture of arranged marriages between first cousins was the “elephant in the room”. Woolas, a former race relations minister, said: “If you have a child with your cousin the likelihood is there’ll be a genetic problem.” The minister, whose views were supported by medical experts this weekend, said: “The issue we need to debate is first cousin marriages, whereby a lot of arranged marriages are with first cousins, and that produces lots of genetic problems in terms of disability [in children].” http://www.timesonline.co.uk/tol/news/politics/article3342040.ece

    Banned in Holland
    The Dutch cabinet wants to ban marriages between cousins and to introduce harsher educational requirements for import brides, PM Jan Peter Balkenende told the Parliament Thursday. http://islamineurope.blogspot.com/2009/09/netherlands-govt-to-ban-cousin.html

    Massive burden on health service
    Medical research suggests that while British Pakistanis are responsible for 3% of all births, they account for one in three British children born with genetic illnesses. The question to think about is: Could the practice of interbreeding be the key to the success and longevity of Islam? Could it be that the genetic and mental illnesses borne of interbreeding are a factor in the unquestioning nature of the majority of Muslims regarding spirituality? http://jacksachinghead.blogspot.com/2008/12/inbreeding-and-its-effects-on-genetic.html

    Successive generations of cousin marriage damage the genes and produce widespread idiocy and insanity – Muslim Healthcare Study
    A problem obviously not talked about much in the Muslim world. 1,400 years of inbreeding (think first cousins marrying) have resulted in a significant on-going health problem and degraded gene pool. While this may explain a lot of things with this culture, how will such immigrants and their ways impact our lives and healthcare support costs. Quite a revelation here from a Denmark study where the impact is obvious. This is serious stuff and you should be aware of this research.

    Nicolai Sennels is a Danish psychologist who has done extensive research into a little-known problem in the Muslim world: the disastrous results of Muslim inbreeding brought about by the marriage of first-cousins.

    This practice, which has been prohibited in the Judeo-Christian tradition since the days of Moses, was sanctioned by Muhammad and has been going on now for 50 generations (1,400 years) in the Muslim world.

    This practice of inbreeding will never go away in the Muslim world since Muhammad is the ultimate example and authority on all matters, including marriage.

    The massive inbreeding in Muslim culture may well have done virtually irreversible damage to the Muslim gene pool, including extensive damage to its intelligence, sanity, and health.

    According to Sennels, close to half of all Muslims in the world are inbred. In Pakistan , the numbers approach 70%. Even in England , more than half of Pakistani immigrants are married to their first cousins, and in Denmark the number of inbred Pakistani immigrants is around 40%.

    The numbers are equally devastating in other important Muslim countries: 67% in Saudi Arabia, 64% in Jordan and Kuwait , 63% in Sudan , 60% in Iraq , and 54% in the United Arab Emirates and Qatar .

    According to the BBC, this Pakistani, Muslim-inspired inbreeding is thought to explain the probability that a British Pakistani family is more than 13 times as likely to have children with recessive genetic disorders. While Pakistanis are responsible for three percent of the births in the UK , they account for 33% of children with genetic birth defects.

    The risk of what are called autosomal recessive disorders such as cystic fibrosis and spinal muscular atrophy is 18 times higher and the risk of death due to malformations is 10 times higher.

    Other negative consequences of inbreeding include a 100 percent increase in the risk of stillbirths and a 50% increase in the possibility that a child will die during labor.

    Lowered intellectual capacity is another devastating consequence of Muslim marriage patterns. According to Sennels, research shows that children of consanguinous marriages lose 10-16 points off their IQ and that social abilities develop much slower in inbred babies.

    The risk of having an IQ lower than 70, the official demarcation for being classified as “retarded,” increases by an astonishing 400 percent among children of cousin marriages.

    (Similar effects were seen in the Pharaonic dynasties in ancient Egypt and in the British royal family, where inbreeding was the norm for a significant period of time.)

    In Denmark , non-Western immigrants are more than 300 percent more likely to fail the intelligence test required for entrance into the Danish army.

    Sennels says that “the ability to enjoy and produce knowledge and abstract thinking is simply lower in the Islamic world.” He points out that the Arab world translates just 330 books every year, about 20% of what Greece alone does.

    In the last 1,200 years years of Islam, just 100,000 books have been translated into Arabic, about what Spain does in a single year. Seven out of 10 Turks have never even read a book.

    Sennels points out the difficulties this creates for Muslims seeking to succeed in the West. “A lower IQ, together with a religion that denounces critical thinking, surely makes it harder for many Muslims to have success in our high-tech knowledge societies.”

    Only nine Muslims have every won the Nobel Prize, and five of those were for the “Peace Prize.” According to Nature magazine, Muslim countries produce just 10 percent of the world average when it comes to scientific research (measured by articles per million inhabitants).

    In Denmark , Sennels’ native country, Muslim children are grossly overrepresented among children with special needs. One-third of the budget for Danish schools is consumed by special education, and anywhere from 51% to 70% of retarded children with physical handicaps in Copenhagen have an immigrant background.

    Learning ability is severely affected as well. Studies indicated that 64% of school children with Arabic parents are still illiterate after 10 years in the Danish school system. The immigrant drop-out rate in Danish high schools is twice that of the native-born.

    Mental illness is also a product. The closer the blood relative, the higher the risk of schizophrenic illness. The increased risk of insanity may explain why more than 40% of the patients in Denmark’s biggest ward for clinically insane criminals have an immigrant background.

    The U.S. is not immune. According to Sennels, “One study based on 300,000 Americans shows that the majority of Muslims in the USA have a lower income, are less educated, and have worse jobs than the population as a whole.” Sennels concludes:

    There is no doubt that the wide spread tradition of first cousin marriages among Muslims has harmed the gene pool among Muslims. Because Muslims’ religious beliefs prohibit marrying non-Muslims and thus prevents them from adding fresh genetic material to their population, the genetic damage done to their gene pool since their prophet allowed first cousin marriages 1,400 years ago are most likely massive. (This has produced) overwhelming direct and indirect human and societal consequences.

    एक और रिपोर्ट भी देखें जो कि पाकिस्तान के डॉन अखबार में प्रकाशित हुई हुई है इसमें भी मूल कारण निकट रक्त संबंधों में विवाह है ऐसा बताया गया है,रिपोर्ट इस प्रकार है-

    Declining mental health
    I.A. RehmanJanuary 04, 2018

    GIVEN the shrinking space for freedom of expression, what should be the subject of the first column in the new year? A frivolous question perhaps but it has to be asked. A look at the mountains of words used over the past few days to describe the anxieties of the state and society shows that the decline in the Pakistani people’s mental health is one of the issues left unattended. The subject thus chooses itself for today’s discussion.

    It is quite a serious matter. Our guide is the Pakistan Association for Mental Health (PAMH), which celebrated the golden jubilee of its existence last year, quite an achievement for a civil society organisation in a state that likes to keep the entire civil society on the chopping block. According to PAMH, more than 34 per cent of the country’s population is at present suffering from one form of mental disorder or another. The figure probably does not include a large number of people who have never seen a psychiatrist and who hotly deny the need for doing so. As a test we have in mind not merely freedom from mental illness but the WHO-defined right to the enjoyment of physical and mental health.

    Further, according to a PAMH survey of mental health between the 2007 and 2009, every second house in Karachi had one or more persons taking tranquillisers; every fourth house had a psychosomatic/psychiatric problem and masked depressive disorder; every tenth house had a patient needing psychiatric care for depression, psychosis, psychosomatic disorder, obsession, intellectual disability, epilepsy or drug dependence. Overall in Karachi there were two million people suffering from mental, emotional, intellectual or social adjustment disorders, of which at least 0.3m needed urgent psychiatric/psychological attention; in the whole of Pakistan 20m people (10 pc of the population according to WHO) were then reported to be mentally ill.

    Over 34pc of Pakistan’s population is at present suffering from some form of mental disorder.

    In Karachi of course there are multiple reasons for the decline in mental health — such as threats to life, fear of gangsters, mafias, extortionists and security forces — that have not assumed epidemic proportions in other parts of the country. But in other areas too, unemployment, increased losses sustained by small farmers, rising cost of living and police excesses pose formidable challenges for the citizens’ mental health. And the anxieties of the rich and the privileged are too well known to need retelling.
    the population of Pakistanis with mental disorders may well be more than what is reported by any organisation.

    At the same time, PAMH has shown that Serious Mental Illness (SMI) “needs only general care of patients including attention to diet, proper hygiene, and regularity in taking the prescribed medicines”. In order for the regimen to be successful, a member of the patient’s family must be inducted as part of the treatment plan and he or she must be able to access a community mental health worker that the association or some other organisation has trained.

    In 2015, the Sindh Mental Health Act was amended to explore the nexus between the attempt to commit suicide and the offence of blasphemy and mental disorder. The amendment, which deserves to be better known and more widely adopted, goes as follows:

    “A person who attempts suicide including (…a person) accused of blasphemy shall be assessed by an approved psychiatrist and if found to be suffering from a mental disorder shall be treated appropriately under the provisions of this Act.”

    The journey of public-spirited practitioners of psychiatry has not ended. For quite some time they have been demanding the following:

    • Aboliting ‘mental hospitals’ and setting up small hostel-like accommodations in every district and even down to the tehsil level.

    • Linking psychiatry departments of teaching hospitals to such hostels and giving institutional advice to the community.

    • Training a new breed of mental health workers and community mental health promoters to take up the major burden of care after diagnosis is made; and

    • Strengthening undergraduate teaching of psychiatry and behavioral science.

    While these demands need to be seriously examined, the sharp decline in the people’s mental health calls for a study by a high-powered commission into the causes of this worrying trend. This body should also suggest measures the state must take, not only to upgrade facilities for the care of people with mental disorders as well as those with serious mental illness, but also to review employment and wage policies, strengthen medicare and social security cover, and revamp the justice and law and order regimes.

    Published in Dawn, January 4th, 2018

    ऊपर लिखे विवरण से आप समझ चुके होंगे कि काफिर जिनमें कुछ बेईमान मुसलमान भी मिल गए हैं किस प्रकार इस्लाम को खत्म करने की साजिश कर रहे हैं, इंशाअल्लाह इनकी सारी कोशिशें नाकाम होंगी।

    अब आप इसकी हकीकत देखें, हम जानते हैं कुरान का फरमान अल्लाह ने यकीन करने वालों के लिए किया है,अकल का ज्यादा इस्तेमाल यकीन को खत्म कर देता है तथा उसे दोजख की राह पर धकेल देता है ,एक मुसलमान का IQ जितना कम रहेगा उतना ही इस्लाम फैलेगा, आवश्यक मात्रा में जिहादी पैदा होंगे जो सुसाइड बंम्बर बन कर इस्लाम की, अल्लाह की खिदमतमंद होंगे, जाहिल होना सदा खराब नहीं होता, अगर अल्लाह की खिदमत हो, बहनों से Nikaah से जो कमअक्ल पैदा होंगे ,वेही इस्लाम के फैलाव में सबसे बेशी मददगार होंगें,
    यहां पर मैं आपको एक अन्य रहस्य की बात बताता हूं जो कि अभी तक वैज्ञानिक भी नहीं जानते, कुरान में अल्लाह ने फरमाया है कि काफिरों को का दोस्त मत बनाओ उनसे घृणा करो, यह तभी हो सकता है जब एक मुसलमान उनसे दूर रहें, उन्हें अपने से अलग समझे,नीचा समझे,मतलब इस्लाम विविधता के अर्थात डाइवर्सिटी के पूरी तरह खिलाफ है,
    रक्त संबंधों में निकाह करने से इंसान के जीन मे एक ऐसा परिवर्तन हो जाता है, जिससे उसकी पहचान का दायरा एकदम कम हो जाता है, अपने से थोड़े भी भिन्न आदमी को वह सहन नही कर सकता,इसके कारण अपने समान दिखने वाले ,जोकि उसके लिये केवल मुसलमान ही होते है, के अलावा भिन्न प्रकार के मनुष्यों को देखकर वह क्रोधित हो जाता है,तथा वह केवल एकदम अपने से समान दिखने वाले लोगों के साथ ही संबंध रखना चाहता है, इस प्रकार वह डाइवर्सिटी के एकदम विरुद्ध हो जाता है,इस्लाम का भी यही फरमान है, सब मुसलमान एक ही तरह सोचे, एक जैसे ही दिखे एक जैसा ही बर्ताव करें,
    इस बात की हकीकत आप इस एग्जांपल से समझ सकते हैं, आपने देखा होगा कि आपके मोहल्ले में जो कुत्ते रहते हैं वे इस विषय में सदा जागरूक रहते हैं कि उनके इलाके में दूसरे इलाके से कोई अलग प्रकार का कुत्ता में न आ जाए,अगर आ जाता है तो आप उनके व्यवहार की समानता एक सच्चे मुसलमान के व्यवहार से कर सकते हैं,जो वह मनुष्यों के साथ करता है, अगर आप गहराई में जाएंगे कि ऐसा क्यों होता है तो आपको पता लगेगा कि इसका कारण उनका आपस में निकाह होना है,जिससे उनके जीन में परिवर्तन हो उनमे यह क्वालिटी पैदा होती है।
    अब आप समझ गए होंगे की बहनों के साथ विवाह का कितना महत्व है और इस्लाम में इसकी क्यों इजाजत दी गई है। साथ ही हमें मोहम्मद साहब की वैज्ञानिक सोच एवं ज्ञान का भी इससे पता लगता है,

    अब अंत में एक दो और बात की और जिसका हमें ध्यान रखना चाहिए कह कर अपनी बात को यहीं पर खत्म करते हैं,
    मुसलमानों में जो कुरान ने माने अल्लाह ने मुसलमानों को जो चार बीवियां रखने की इजाजत दी है,हो सके तो सभी मुसलमानों को इस इजाजत का फायदा उठाना चाहिए, इससे जो फायदा होता है मैं नीचे बता रहा हूं,-
    सबसे बड़ा फायदा तो यह है इससे अधिक बच्चे, माने मुसलमान पैदा होंगे एवं बहुत जल्दी पूरी दुनिया पर अल्लाह का कब्जा करने में मददगार होंगें,
    दूसरा लाभ यह है अधिक बच्चे होने से उनको अच्छी तालीम नहीं मिलेगी इससे वे विश्वासी मुसलमान बने रहेंगे, एवं जिहाद के लिए सबसे अच्छे मददगार होंगे,साथ ही वे भी अधिक बच्चे पैदा करके मुसलमानों की तादाद बढ़ाएंगे।
    तीसरा फायदा यह है अगर आपके कम बच्चे होंगे तो आप आसक्ति के कारण उनका उपयोग जिहाद के लिए करने में हिचकिचाएंगे, अधिक बच्चे होने पर उनमें से 2 -3 अगर जिहाद करते हुए मर भी जाते हैं तो आपको उसे कोई कष्ट नहीं होगा, बल्कि अल्लाह की खिदमत के लिए आपने कुछ किया इससे आपको चैन हासिल होगा, अल्लाह की नियामतें आप पर बरसेगी।

    कभी आपने सोचा है कि अल्लाह को कुर्बानी क्यों पसंद है, इसका मकसद यह है कि आप अधिक से अधिक पशुओं का मांस खाएं, कुर्बानी के बहाने, प्राचीन काल से ही एक कहावत चली आ रही है, जैसा खाए अन्न वैसा बने मन, प्रचुर मात्रा में मांस खाने से आपके अंदर पशुवृति का विकास होगा, एक मुसलमान के लिए, एक जिहादी के लिए ऐसी वृत्ति का होना आवश्यक है जो उसमें काम, क्रोध, बदले की भावना, हिंसा , क्ररता एवं मूढ़ता को बनाए रखें, इस कारण प्रत्येक मुसलमान को चाहिए कि अपने भोजन में काफी मात्रा में मांस रखे, बच्चों में भी बचपन से ही अधिक से अधिक मांस खाने की हवस को बढ़ाना चाहिए, इससे उन्हें जिहाद के लिए सदा बेचैनी बनी रहेगी, शांति से बैठ कर वे अपना जीवन नष्ट नहीं करेंगे,काफिरों का शिकार करते हुए अल्लाह की खिदमत में लगे रहेंगे।

    ऊपर जो जो बातें कहीं गई है उसका सब मुसलमानों को अमल में लाना चाहिए, इससे अल्लाह की नियामतें और खुशी की बरकत होगी,सब कुछ जानने वाला अल्लाह आपको सही राह दिखाये। अमीन।

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  2. एक मुसलमान कैसे बनाए
    (How to create a killer robot)

    यहां पर हम एक मनुष्य को कैसे मुसलमान बनाया जाता है इसकी प्रक्रिया समझने का प्रयास करेंगे, इस प्रक्रिया का विगत् 1400 वर्षों से समग्र विश्व में सफलतापूर्वक प्रयोग किया जाता रहा है। इस काल में पृथ्वी के एक तिहाई मनुष्यों को मुसलमान बनाया जा चुका है। पैगंबर मोहम्मद ने सर्वप्रथम इस प्रक्रिया का आविष्कार एवं व्यवहारिक प्रयोग किया था।
    एक मनुष्य में एवं मुसलमान में क्या अंतर है आपके इस प्रश्न का उत्तर आगे अपने आप मिल जायेगा, अगर अभी तक आप यह नहीं जानते हों।
    इस पृथ्वी पर दो प्रकार के लोग वास करते हैं एक तो वह हैं जो अभी भी मनुष्य हैं एवं वे जो मुसलमान बनाए जा चुके हैं।
    सर्वप्रथम हम उस रहस्य का खुलासा करेंगे जिसके द्वारा एक मुसलमान परिवार में पैदा होने वाले मनुष्य को मुसलमान बनाया जाता है।
    जो लोग अभी तक मुसलमान नहीं बने हैं उन्हें कैसे मुसलमान बनाया जाये इसका विचार इस लेख के द्वितीय भाग में करेंगे।
    एक मुस्लिम परिवार में बच्चा जन्मते ही इसकी सावधानी रखनी चाहिए कि कहीं वह मनुष्य न बन जाए ,कलमा पढ़ते ही उसके दिमाग में यह बात उसमे कूट-कूटकर भर देना चाहिए कि अल्लाह ही एकमात्र ईश्वर है एवं मोहम्मद उसका एक मात्र एवं अंतिम पैगंबर। साथ ही में सहायक अन्य कर्मकांडों का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए,
    जैसे कि अल्पआयु से ही उसमे अल्लाह को खुशी के लिए पशुओं को हलाल करने की आदत डालनी चाहिए, इससे अन्य प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता के कारण जो दया आदि के भाव मनुष्य में होते हैं, यह मानवीय दुर्बलता, हिचक पशुओं का गला रेतते रेतते उसमें दूर हो जाए एवं वह सच्चा जिहादी मुसलमान बन सके, एक दिल में दया एवं क्रूरता एक साथ नहीं रह सकते, इस कारण यह ट्रेनिंग बचपन से ही आवश्यक है ।
    इस प्रक्रिया की उपयोगिता एक सच्चे उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं,-

    अभी एक – डेढ़ वर्ष पहले बांग्लादेश में कुछ कॉलेज में पढ़ने वाले मुसलमान विद्यार्थियों ने एक रेस्टोरेंट में जाकर प्रायः 15:20 काफिर स्त्री पुरुषों का गला काटकर उन्हें हलाल कर दिया, अल्लाह की यह सेवा वे तभी कर पाए, जब उनके सच्चे मुसलमान माता-पिता उनको बचपन से पशुओं का गला काटने का अभ्यास कराते आ रहे थे, एक सामान्य मनुष्य कभी भी ऐसा कार्य नहीं कर सकता, केवल अत्यंत क्रूर हत्यारों के द्वारा एवं एक सच्चे मुसलमान द्वारा ही ऐसा कार्य संभव होता है,भारत में फांसी की सजा बहुत कम होती है अब तो यह स्थिति है की फांसी देने वाले लोग मिलने कठिन हो गए हैं, पहले भीजो जल्लाद फांसी देता था उसको शराब इत्यादि पीला कर इसके लिए तैयार किया जाता था ,यह तो की स्थिति है जब कि उसे केवल फांसी की रस्सी खीचनी पढ़ती है, जब एक जिहादी एक जीवित इंसान का गला काटता है अपने पूरे होशो हवास में बिना कोई अपराधबोध के, तो इससे आप बाल अवस्था से हलाल ट्रेनिंग का महत्व समझ गए होंगें।
    मैंने एक पाकिस्तानी वीडियो YouTube पर देखा, जिसमें एक 3 वर्ष के बच्चे को एक नकली चाकू द्वारा एक खिलौना बकरी का गला काटना(हलाल करना) सिखाया जा रहा था एवं उसे घेर कर बहुत से स्त्री पुरुष तालियां बजा रहे थे एवं उसे उत्साहित कर रहे थे, यह एक आदर्श उदाहरण है।
    इसी प्रकार पाकिस्तान के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार Don में बड़े-बड़े चित्रों के साथ एक लेख प्रकाशित किया गया था इसमें बड़े मकान में जिस के गलियारों में सैकड़ों व्यक्ति खड़े होकर आंगन में एक गाय के गला रेतने का दृश्य देख रहे थे एवं खुशी मना रहे थे ,संसार में अधिकांश लोग मांसाहारी हैं, पर बहुत कम लोग ही स्वयं किसी पशु की हत्या कर पाएंगे या उसे तड़पते हुए मरते देख कर खुशी मना पाएं, लेकिन एक सच्चे मुसलमान मे बचपन से मिली ट्रेनिंग के कारण यह हिचक दूर हो जाती है, इसी के कारण वह पशु एवं इंसान को हलाल करने को इंजॉय कर पाता है। बच्चे मैं बचपन से ही वह मुसलमान है एवं अन्य सब काफिर है, यह विचार उसमें कूट कूट कर भर दिया जाना चाहिए, तभी वह सच्चा जिहादी बन कर गला रेतने की इस कला का सदुपयोग इस्लाम के प्रसार के लिए कर पाएगा।
    अगर आपने इतना कर लिया है तो प्रथम चरण का कर्तव्य आपने पूरा कर दिया,

    अब हम द्वितीय चरण मैं मुसलमानीकरण की सबसे महत्वपूर्ण तकनीक के रहस्य का खुलासा करेंगे।

    आपका बच्चा कुछ बड़ा हो गया है एवं आपने उसे यथासाध्य बाहरी हवाओं से बचा कर भी रखा है परंतु वह अब पढ़ने के लिए मदरसे मे या स्कूल में जाएगा, कोशिश यही करनी चाहिए कि उसे मदरसा मे ही भेजा जाए एक मुसलमान बच्चे के लिए मदरसा अधिक सुरक्षित है, स्कूलों में विज्ञान आदि कि जो आधुनिक शिक्षा दी जाती है वह तो एक कुफ्र के अलावा कुछ नहीं है एक मुसलमान का ईमान भ्रष्ट करने के लिए ही काफिरों ने इन स्कूलों को बनाया है दुर्भाग्यवश मुस्लिम देशों में भी इनका प्रचलन हो रहा है पर हमें इनसे अपने बेटे बेटियों को बचाना चाहिए।
    पर आप कितना भी बचाये, इसकी पूरी संभावना है कि उस पर काफिरों अर्थात मनुष्यों का प्रभाव पड़ जाए, इस संभावना को पूरी तरह खत्म करने के लिए इस द्वितीय चरण की प्रक्रिया का ईजाद मोहम्मद साहब ने किया है ,सभी सच्चे मुसलमानों का यह फर्ज है कि इस प्रक्रिया का पूरी तरह अपने बच्चों पर इस्तेमाल करें । दिखने में सामान्य सी लगने वाली इस प्रक्रिया का कितना मजबूत एवं दूरगामी प्रभाव है यह हम आपको आगे बताएंगें। इसी के द्वारा एक मनुष्य सदा के लिए एक सच्चा दीनी मुसलमान बन जाता है।
    अब तक आपने अपने बच्चे को जो कुछ भी बताया है या सिखाया है वह सब केवल बातें हैं उन पर कुसंग के कारण कभी भी संदेह जग सकता है, प्रश्न उठ सकता है,एक विश्वासी मुसलमान के लिए संदेह करना या प्रश्न करना जुर्म है जो कि उसे दोजक की आग में भी जलायेगा, इसी कारण मोहम्मद साहब पर पूरा यकीन करना जरूरी है है, पर इनसानी फिरकत के कारण मनुष्य के मन में अनेक विषयों पर प्रश्न उठते हैं, एक मुसलमान को इससे बचना चाहिए पर सदा ऐसा हो नहीं पाता वह विविध विषयों में सच्चाई का प्रमाण चाहता है, इस निम्न प्रक्रिया द्वारा हम बच्चे को ईस्लाम की सच्चाई का एक स्थाई प्रमाण देते हैं अब वह कभी भी मोहम्मद साहब, अल्लाह एवं कुरान की सच्चाई पर संदेह नहीं करेगा।
    ईस्लाम में खतने की व्यवस्था इसी मानसिक अवस्था को ध्यान में रखकर की गई है,आदमी की चाहे वह मर्द हो या औरत वह अपनी पहचान (Identety) अपने लिंग के द्वारा ही करता है,खतने का वक्त मर्द के लिंग की ऊपरी चमड़ी को जब काटा जाता है या स्त्री के भंगाकुर को जब छीला जाता है तब उसके दिमाग पर इसका एक गंभीर आघात लगता है जो कि उसके दिमाग में सदा के इसका एक निशान छोड़ जाता है, यह इतना गहरा होता है की उसका प्रभाव मरने तक बना रहता है,दिमाग का एक भाग इससे कुंद होजाता है, मर जाता है, इस प्रक्रिया में होने वाला दर्द अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि उसी के अनुपात में दिमाग में इसकी कम या गहरी छाप बनती है, ऑपरेशन आदि द्वारा सुन्न कर के जो खतना किया जाता है वह इस्लाम के विरुद्ध है,( नही तो मुहमम्द साहब वैसाही फरमान करते )क्योंकि इससे कोई दर्द नहीं होता एवं इस कारण दिमाग पर उसकी गहरी छाप नहीं पड़ती है जो कि खतने का मूल उद्देश्य है, इसका आधात एवं दर्द जिस प्रकार उसे ईस्लामिक जहन्नुम की सच्चाई पर यकीन दिलाता है, उसी प्रकार सेक्स करने से मिलने वाला सुख उसे जन्नत की सच्चाई पर यकीन दिला देता है,जोकि ईस्लाम का अंतिम मकसद है, जहन्नुम की आग का डर एवं औरत मर्दों को सेक्स से मिलने वाला मजा,इस्लामिक स्प्रिचुअलटी।
    अब हम खतने से दिमाग पर पड़ने वाले रहस्यमय असर का खुलासा कर रहे हैं, जैसा कि पहले कहा गया है आपने बच्चे को अब तक जो भी इस्लाम के बारे में, मोहम्मद साहब, कुरान या अल्लाह के बारे में बताया है, वे सब विचार मात्र है,इनकी हकीकत का उसके पास कोई प्रमाण नहीं है, परंतु यह सब विचार ( आईडियोलोजी) एवं कर्मकांड जो कि आपने एक रूहानी शिक्षा के अंग के रूप में बच्चे के दिमाग में बैठाया है वह सब खतने के समय जिसे भी आपने एक रूहानी रिचुअल के रूप में संपन्न ने किया है, बच्चे के दिमाग मे, दोनों एक साथ मिल जाते हैं तथा इसे भी खतने जैसी असलियत मिल जाती है, बालक के अपरिपक्व दिमाग में यह एक हकीकत का (अनुभव) जामा पहन लेता है,अब बच्चे के लिए खतने के समय होने वाला दर्द एवं चोट जितनी सच्ची थी, अल्लाह, कुरान एवं मोहम्मद की तालीम भी उसके लिए उतनी ही सच्ची हो जाती है, जिस प्रकार वह खतने चोट और दर्द को वह इनकार नहीं सकता उसी प्रकार वह कुरान एवं मोहम्मद तथा अल्लाह को भी इनकार नहीं सकता क्योंकि उसके दिमाग में यह एक वास्तविक हकीकत के रुप में घर कर गए हैं, लिंग की भाँति यह भी उसकी पहचान का हिस्सा बन जाता है, उसके लिये दोनों मे फर्क करना नामुमकीन होजाता है,
    विषय को स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण लेते हैं, एक अंधरे कमरे में एक बच्चे को भयावह भूतों की फिल्म दिखाएं जिसमें एक भूत एक बच्चे का गला दबा रहा है एवं ठीक उसी समय पीछे से अगर कोई व्यक्ति उस बच्चे का गला दबाएं तो यह काल्पनिक फिल्म का दृष्य एवं गला दबाने हकीकत मिलकर बच्चे के लिए असलियत बन जाती है,अब आप बच्चे को कोई लाख समझाएं कि भूत नहीं होते वह आपकी बात कभी नहीं मानेगा, क्योकि दिमाग पर पड़ी इस सच्चे अनुभव की यह छाप, फिल्मी काल्पनिक भूत के साथ मिल सदा के लिए उसके लिए एक हकीकत बन जाती है, का रूप धारण कर लेती है, इससे आप समझ सकते हैं कि किस प्रकार एक मुसलमान के लिए अल्लाह, कुरान एवं मोहम्मद एक ऐसी हकीकत हो जाती है जिसे उसने स्वयं अनुभव किया है, जिसे नकारना उसके लिये कभी भी मुमकीन नहीं है क्योंकि अब ये उसके अपने व्यक्तित्व, आइडेंटिटी के अंग बन चुके हैं,कोई भी व्यक्ति अपनी आइडेंटिटी को नकार नहीं सकता वह उसका अपना अस्तित्व है ।

    एक अन्य उदाहरण लेते हैं, पहले एवं अभी भी अनेक देशों में बछड़ा खेती के काम आ सके, वह सांड न बन जाए इसके लिए उसे बघिया (to castrate) किया जाता है, इस प्रक्रिया में बछड़े के अंडकोषों को कुचल दिया जाता है, इस भयानक आधात एवं दर्द का प्रभाव उसके शरीर पर एवं दिमाग पर इतना तीव्र होता है की अगर कोई व्यक्ति उसकी पूंछ के पास बरसों बाद भी हाथ में ले जाता है तो वह क्रोध से एवं आतंक से उछल पड़ता है, बैलगाड़ी चलाने वाले उसे दौड़ाने के लिए ऐसा करते हैं, यही हम मुसलमानों में देख सकते हैं कुरान, इस्लाम या मोहम्मद के प्रति कोई भी विपरीत बात उनमें भयंकर भय एवं क्रोध उत्पन्न करती है इसका मूल कारण ऊपर लिखित खतने प्रक्रिया है,
    एक और भी रहस्यमय सच्चाई है जिसे लोग नहीं समझते, एक मुसलमान जब कहता है अल्लाह ही एकमात्र सच्चा ईश्वर है,मोहम्मद उसका सच्चा पैगंबर है तब वह एक हकीकत का ही वर्णन कर रहा होता है, वह तब अपने उस हकीकत का ही जिक्र कर रहा होता है जिसे उसने खतने के समय महसूस किया था,जब उसे दी गई अल्लाह, ईस्लाम और मुहम्मद संबन्धी कल्पना ने उसके लिये एक हकीकत का का जामा पहन लिया था,

    भारत में कुछ वर्ष पहले एक फिल्म बनी थी जिसमें उसका हीरो सुपरमैन की तरह नाना प्रकार के करतब दिखाता है, आकाश में उड़ना ऊंचे मकानों से कूदना आदि आदि, इस फिल्म को देखकर बहुत से बच्चे वैसा ही करने जा कर जख्मी हो गए संभवत कुछ मर भी गए ऐसा अखबारों में समाचार आया था, ऐसा क्यों हुआ अगर आप इस पर विचार करेंगे तो पता लगेगा एक बच्चे का दिमाग इतना विकसित नहीं होता जिससे वह वास्तविकता एवं कल्पना में अंतर कर सके, फिल्मी दृश्य को सत्य समझकर बच्चों ने उसका अनुसरण किया।
    इस लेख में जो जो प्रक्रिया में बताई गई हैं उसके पालन से एक मुसलमान का दिमाग महजब के विषय में सदा एक 7-8 वर्ष के बच्चे जैसा ही बना रहता है उसके लिए वास्तविकता एवं कल्पना में अंतर करना संभव नहीं होता कल्पना उसे एकदम Haqeeqat जैसी लगती है, अब एक मुसलमान के लिए अल्लाह एक हकीकत है कल्पना नहीं सामान्य मनुष्य इसे आंशिक रूप से ही सत्य मानता है एवं अपने विवेक का उपयोग करता है।

    अभी कुछ ही दिन पहले की घटना नीचे दी जा रहीं है,इससे आप एक मुसलमान का दिमाग कैसे काम करता है इसे थोड़ा समझ पाएंगे-

    Jodhpur: Man ‘sacrifices’ daughter to please God during Ramzan, arrested
    NewsBytes
    Shalini Ojha
    10 Jun 2018: Jodhpur: Man ‘sacrifices’ daughter to please God during Ramzan, arrested
    A 26-year-old man identified as Nawab Ali Qureshi was arrested by Jodhpur police on Saturday for killing his four-year-old daughter.
    The child, Rizwana, was found with her throat slit. Qureshi claimed he had sacrificed his beloved daughter to please God during the holy month of Ramzan.
    After interrogation, Rizwan, who stays in Silawaton Ka Mohalla, confessed to the crime.

    The incident: Before slitting throat, Qureshi bought goodies for daughter
    On Thursday, Qureshi took his daughter to the market and bought goodies for her.
    In the night, as everyone in the house was sleeping, he took her to the terrace, recited the Kalma, told her he loved her, and slit her throat.
    “I am a devout Muslim and love my daughter more than my life,” Qureshi said.
    The little one was buried on Friday.

    ऐसी ही एक घटना भी देखें-
    Ramadan in Pakistan: Man’s father and brother gouge out his eyes for “violating Islamic values”
    MAY 29, 2018
    Abdul Baqi, 22, thought his family would help him get married. Instead, his father and four brothers accused him of violating Islamic values and removed his eyes to punish him.
    The cruelty of Islamic hardliners knows no boundaries. You violate Islamic law, you could be stoned to death, thrown from a building, caned, honor-killed, and in this case:
    One of my brothers removed my eyeball using a tea spoon. Then my father took the knife and cut it as it was hanging on my face..One of them [brothers] stepped on my head to make sure I that I do not move and others removed my second eye
    His brothers had warned him that speaking to a girl over the phone was an un-Islamic act and that he was an infidel.

    Family photo becomes new picture of militancy in Indonesia
    MARGIE MASON
    Associated Press15 May 2018
    JAKARTA, Indonesia (AP) — In the photo, the mother rests one hand on her youngest son’s arm. Two little sisters in the front hold flowers against matching red head scarves. Dad stands in the back next to the oldest son who has already outgrown him. The six are dressed in happy prints and colors — a purple batik shirt, a pink flowered dress — and Mom’s flowing headscarf is the color of sky.
    But on Sunday, they fanned out with suicide bombs attached to themselves and their children, attacking three churches. The entire family was killed in Indonesia’s second-largest city of Surabaya. At least 13 people died in the churches and more than 40 others were injured. The youngest human bomb, the little girl staring directly at the camera with big brown eyes, was just 8 years old. Her big sister was 12.
    Before people had time to fully process that children had been used for the first time to carry out a suicide attack in Indonesia, it happened again. Another family — including a 7-year-old child who survived — participated in a similar suicide mission at police headquarters in the same city on Monday.
    Three members of a third family also died when homemade bombs exploded in their apartment Sunday night, and three children survived.
    Police said their investigation found the three families knew each other and came together on Sundays to study and recite the Quran. They indoctrinated their children in various ways at the meetings, including showing violent jihadist videos, East Java police chief Machfud Arifin said.

    आम इनसान केलिये अभी तक जो ईश्वर एक कल्पना मात्र है,अब यह एक मुसलमान के लिए हकीकत है, कोरे तर्क उसे हुए वास्तविक अनुभव के सामने नकार नहीं सकते, अच्छे अच्छे विद्वान भी नहीं समझ पाते कि यह व्यक्ति किस चीज के विषय में बोल रहा है एवं व्यर्थ तर्क करते हैं,कोई भी तर्क दिमाग पर पड़े खतने के प्रभाव की सच्चाई के समान तीव्र नहीं हो सकता, जो कि अब उसकी आइडेंटिटी बन चुका है,जिसके विषय मे वह बोल रहा होता है, यहाँ तक कि उच्चतम आधुनिक शिक्षा भी उसपर कोई प्रभाव नहीं डाल पाती क्यों कि उसके दिमाग का एक अंश खतने से डेमज होचुका होता है,उनको आपका कोई भी तर्क प्रभावित नहीं कर सकता।
    यह कहना तो व्यर्थ है कि खतने के द्वारा मनुष्य के शरीर का एवं मस्तिष्क का जो अपंगीकरण किया जाता है, इससे एक मनुष्य के रुप मे उसकी आईडेंटी खत्म हो, वह एक मुसलमान है इसकी याद उसमे सदा बनी रहती है, नहाते समय, स्त्री मिलन के वक्त या जब भी वह नंगा होता है, उसका लिंग उसे यह याद दिला देता है कि मैं एक मुसलमान हूं,अब यह शख्स मनुष्यों से कट कर, इसकी अपनी पहचान एवं सहानुभूति केवल मुसलमानों प्रति ही खास रुप से सीमित हो जाती है,जिस प्रकार पशुओं को पहचानने के लिये गरम लोहे से छाप से लगाई जाती है यह भी कुछ वैसा ही है , मुसलमान एक दूसरे तथा अन्य व्यक्ति मे फर्क को इससे पहचानते हैं।
    अब यहां पर यह देखेंगे कि एक मुसलमान का दिमाग कैसे कार्य करता है, सामान्य मनुष्य जब कोई कार्य करता है तब उसकी बुद्धि पीछे के अनुभवों से कार्य कर्णीय है या नहीं इसका निर्णय करती है,जब उसकी बुद्धि पीछे हुए अनुभव के आधार पर ठीक से निर्णय नहीं ले पाती, या फिर गलत निर्णय लेती है तब उसके लिए सामान्य भाषा में कहा जाता है कि उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है, अंग्रेजी में इसके लिए एक सुंदर शब्द है, लॉस्ट माय रीजन है, जब किसी मनुष्य में एक विशेष प्रकार की टेंडेंसी प्रबल हो जाती है तब वह सामान्य विवेक का व्यवहार नहीं कर पाता एवं विशेष टेंडेंसी ही उसके व्यवहार को परिचालित कर करती है,ऊपर हमने एक मुसलमान बनाने के लिए जिन प्रक्रियाओं का वर्णन किया है उसके द्वारा उसमें एक विशेष प्रकार की टेंडेंसी को इतना प्रबल कर दिया जाता है कि अब उसके सामान्य विवेक के स्थान पर दिमाग में बैठाई गई यह टेंडेंसी,जो कि उसे जीवन में हुए अनुभवों,जिनके आधार पर बुद्धि किसी निर्णय पर पहुंचती है, ही सब को दबाकर, उसको परिचालित करती है यह व्यवहार में कैसे प्रकट होती है इसको हम नीचे दिए गए उदाहरण से समझेंगे-
    अभी कुछ दिन पहले कश्मीर में एक जिहादी लड़के के माता-पिता से सेना के कुछ अधिकारी मिलने गए एवं उन से अनुरोध किया कि आप अपने बच्चे को समझाएं, उसे किसी अच्छे रोजगार में लगाएं,या पढ़ने के लिए स्कूल में भेजें, इस पर बच्चे के माता-पिता ने सेना के अधिकारियों को उत्तर दिया कि अगर हमारा बच्चा जिहाद करते हुए मर जाता है तो यह हमारे लिए एक फक्र का विषय होगा।
    अब यहां पर हम देखते हैं कि इन मुसलमान माता पिता के मन में पूरा विश्वास है कि मरते ही उनका लड़का जन्नतरशिद हो जाएगा, साथ ही हमें यह भी पता लगता है कि उनके लिए बच्चे के पास जीवित रहते हुए करने योग्य इससे कोई अच्छा कार्य नहीं है,सामान्य मनुष्य में ऐसी परिस्थिति में जो मृत्यु भय, पकड़े जाने पर जेल की यातना, अपंग हो जाने का भय,जीवन में कुछ उन्नति की इच्छा, कुछ विशेष प्राप्ति की इच्छा,आदि जो भावनायें एवं विचार जगते हैं, वह सब ऊपर बताई गई टैनिंग से खत्म हो जाती है दिमाग केवल बताई गई दिशा में ही सोचता एवं कार्य करता है।
    अब आप समझ गए होंगे कि इस प्रक्रिया का एक मुसलमान बनाने मे कितना महत्व है, नीचे हम वास्तव में खतना किस प्रकार होना चाहिए इसका एक जीवंत विवरण दे रहे हैं, यह रीडर्स डाईजेस्ट मे छपे लेख का अंश मात्र है, पूरा लेख आप गूगल कर (Ayaan Hirsi Ali के लेख मे) देख सकते हैं –

    Becoming a Woman

    In a nomadic culture like the one I was raised in, there is no place for an unmarried woman, so mothers feel it is their duty to ensure their daughters have the best possible opportunity to get a husband.
    And since the prevailing wisdom in Somalia is that there are bad things between a girl’s legs, a woman is considered dirty, oversexed and unmarriageable unless those parts–the clitoris, the labia minora, and most of the labia majora-are removed. Then the wound is stitched shut, leaving only a small opening and a scar where the genitals had been-a practice called infibulation.
    Paying the gypsy woman for this circumcision is one of the greatest expenses a household will undergo, but is considered a good investment. Without it the daughters will not make it onto the marriage market.
    The actual details of the ritual cutting are never explained to the girls-it’s a mystery. You just know that something special is going to happen when your time comes. As a result, all young girls in Somalia anxiously await the ceremony that will mark their becoming a woman. Originally the process occurred when the girls reached puberty, but through time it has been performed on younger and younger girls.
    One evening when I was about five, my mother said to me, “Your father ran into the gypsy woman. She should be here any day now.”
    The night before my circumcision, the family made a special fuss over me and I got extra food at dinner. Mama told me not to drink too much water or milk. I lay awake with excitement, until suddenly she was standing over me, motioning. The sky was still dark. I grabbed my little blanket and sleepily stumbled along after her.
    We walked out into the brush. “We’ll wait here,” Mama said, and we sat on the cold ground. The day was growing lighter; soon I heard the click-click of the gypsy woman’s sandals. Then, without my seeing her approach, she was right beside me.
    “Sit over there.” She motioned toward a flat rock. There was no conversation. She was strictly business.
    Mama positioned me on the rock. She sat behind me and pulled my head against her chest, her legs straddling my body. I circled my arms around her thighs. She placed a piece of root from an old tree between my teeth. “Bite on this.”
    Mama leaned over and whispered, “Try to be a good girl, baby. Be brave for Mama, and it’ll go fast.”
    I peered between my legs and saw the gypsy. The old woman looked at me sternly, a dead look in her eyes, then foraged through an old carpet-bag. She reached inside with her long fingers and fished out a broken razor blade. I saw dried blood on the jagged edge. She spit on it and wiped it on her dress. While she was scrubbing, my world went dark as Mama tied a blindfold over my eyes.
    The next thing I felt was my flesh being cut away. I heard the blade sawing back and forth through my skin. The feeling was indescribable. I didn’t move, telling myself the more I did, the longer the torture would take. Unfortunately, my legs began to quiver and shake uncontrollably of their own accord, and I prayed, Please, God, let it be over quickly. Soon it was, because I passed out.
    When I woke up, my blindfold was off and I saw the gypsy woman had piled a stack of thorns from an acacia tree next to her. She used these to puncture holes in my skin, then poked a strong white thread through the holes to sew me up. My legs were completely numb, but the pain between them was so intense that I wished I would die.
    My memory ends at that instant, until I opened my eyes and the woman was gone. My legs had been tied together with strips of cloth binding me from my ankles to my hips so I couldn’t move. I turned my head toward the rock; it was drenched with blood as if an animal had been slaughtered there. Pieces of my flesh lay on top, drying in the sun.
    Waves of heat beat down on my face, until my mother and older sister, Aman, dragged me into the shade of a bush while they finished making a shelter for me. This was the tradition; a little hut was prepared under a tree, where I would rest and recuperate alone for the next few weeks.
    After hours of waiting, I was dying to relieve myself. I called my sister, who rolled me over on my side and scooped out a little hole in the sand. “Go ahead,” she said.

    The first drop stung as if my skin were being eaten by acid. After the gypsy sewed me up, the only opening left for urine-and later for menstrual blood-was a minuscule hole the diameter of a matchstick.
    As the days dragged on and I lay in my hut, I became infected and ran a high fever. I faded in and out of consciousness. Mama brought me food and water for the next two weeks.
    Lying there alone with my legs still tied, I could do nothing but wonder, why? What was it all for? At that age I didn’t understand anything about sex. All I knew was that I had been butchered with my mother’s permission.
    I suffered as a result of my circumcision, but I was lucky. Many girls die from bleeding to death, shock, infection or tetanus. Considering the conditions in which the procedure is performed, it’s surprising that any of us survive.

    The Marriage

    I was around 13 when came home one evening and called, “Come here,” in a soft voice. Normally he was very stern, so I began to feel suspicious.
    He sat me on his knee. “You know,” he began, “you’ve been really good.” Now I knew something serious was up. “You’ve been working hard as any man, taking good care of the animals. And I want you to know I’m going to miss you very much.”
    When he said this, I thought he was afraid I was going to run away like my sister, Aman, had when he had tried to arrange her marriage.
    I hugged him. “Oh, Papa, I’m not going anywhere.”
    He pulled back, stared at my face and said, “Yes, you are, my darling. I found you a husband.”
    “No, Papa, no!” I shook my head. “I’m not going to marry.”
    I had grown into a rebel, sassy and fearless. Papa had to find me a husband while I was still a valuable commodity, because no African man wanted to be challenged by his wife. I felt sick and scared.
    The next day I was milking my goats when my father called, “Come here, my darling. This is Mr.-”
    I didn’t hear another word. My eyes fastened onto a man sitting down, holding on to a cane. He was at least 60 years old, with a long white beard.
    “Waris, say hello to Mr. Galool.” (name has been changed to protect privacy)
    “Hello,” I said in the iciest voice I could muster.
    The old fool just sat there grinning at me. I stared at him in horror. I looked at my father, and when he saw my face, he realized his best tactic was to shoo me away so I didn’t scare off my prospective husband. “Go finish your chores,” he said.
    I ran back to my goats.
    Early the next morning my father called me. “You know that was your future husband.”
    “But Papa, he’s so old!”
    “That’s the best kind. He’s too old to run around. He’s not going to leave you. He’ll look after you. And besides,” Papa grinned proudly- “he’s giving me five camels.”

    अब हम इस भाग में कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का वर्णन करेंगे जो कि एक मुसलमान के लिए आवश्यक कर्तव्य एवं उसके खालिस मुसलमान बने रहने में सहायक है साथ ही सारे संसार को मुसलमान बनाना, जो कि एक मुसलमान जरूरी फर्ज है, मैं भी मददगार होंगे, प्रत्येक सच्चे मुसलमान को इनका पालन करना चाहिए –
    मुसलमानों में जो अपनी चचेरी,ममेरी बहनों के साथ Nikaah करने का रिवाज है, जिसकी ईजाजत ईस्लाम देता है, इसे जारी रखना चाहिए,क्योंकि अगर इसमें कोई वास्तविक खराबी होती तो सब कुछ जानने वाला अल्लाह एवं मोहम्मद इसकी इजाजत नहीं देते,इसमें क्या अच्छाई छुपी है इसके रहस्य का खुलासा हम आगे करेंगे, हालांकि आधुनिक विज्ञान इसके खिलाफ है, वैज्ञानिक खोजों से पता लगा है कि इस प्रकार के विवाह से मानसिक एवं शारीरिक रूप से विकृत संतानों का जन्म होता है, हाल ही में लंदन में वैज्ञानिकों एवं डाक्टरों ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें बताया गया है कि-

    Minister: Muslim ‘inbreeding’ in Britain is causing massive surge in birth defects
    Last updated at 19:36 10 February 2008
    Phil Woolas
    Inbreeding among immigrants is causing a dramatic rise in birth defects, a government minister has warned.
    Referring to the culture of Muslim arranged marriages between cousins, environment minister Phil Woolas said: “If you have a child with your cousin the likelihood is there’ll be a genetic problem.”
    Mr Woolas, whose views were supported today by medical experts, said the practice did not extend to all Muslim communities and that most cases occur in families from rural Pakistan, where up to half of all marriages are thought to involve first cousins.
    According to today’s Sunday Times, the minister, who represents Oldham East and Saddleworth said: “If you talk to any primary care worker they will tell you that levels of disability among the . . . Pakistani population are higher than the general population. And everybody knows it’s caused by first cousin marriage.
    “That’s a cultural thing rather than a religious thing. It is not illegal in this country.
    “The problem is that many of the parents themselves and many of the public spokespeople are themselves products of first cousin marriages.
    “It’s very difficult for people to say ‘you can’t do that’ because it’s a very sensitive, human thing.”
    Today he was backed by chief whip Geoff Hoon, who said: “He was commenting on a particular problem about cousins marrying first cousins.
    “It is important that we look at that in terms of scientific expertise and the extent to which it is actually causing problems.
    “But it obviously is a very sensitive matter and no one, no one, would suggest this is a problem for the wider Muslim community.
    “I am confident that what he has said will have been said with sensitivity and with proper regard to his Muslim constituents and Muslims right across the United Kingdom.”
    “If you are supportive of the Asian community then you have a duty to raise this issue.
    “Awareness does need to be raised but we are very aware of the sensitivities,” he added,
    Mr Woolas said the issue is “very sensitive” and rarely debated and was supported by Labour MP for Keighley, Ann Cryer, who called for the NHS to do more to warn parents of the dangers of inbreeding.
    She said: “This is to do with a medieval culture where you keep wealth within the family.”
    “If you go into a paediatric ward in Bradford or Keighley you will find more than half of the kids there are from the Asian community. Since Asians only represent 20 per cent-30 per cent of the population, you can see that they are over represented.
    “I have encountered cases of blindness and deafness. There was one poor girl who had to have an oxygen tank on her back and breathe from a hole in the front of her neck.
    “The parents were warned they should not have any more children. But when the husband returned again from Pakistan, within months they had another child with exactly the same condition.”

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  3. Good that you writig in hindi. It should be translated in other regional
    languages to make it impacts,

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