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जानिए गजवा-ए-हिन्द क्या है।


जानिए गजवा-ए-हिन्द क्या है।

पहले तो यह जाने की गजवा-ए-हिन्द का मतलब क्या है, काफिरों को जीतने के लिए किये जाने वाले युद्ध को “गजवा” कहते हैं और जो इस युद्ध में विजयी रहता है उसे “गाजी” कहते हैं, जिस भी आक्रान्ता और अक्रमंनकारी के नाम के सामने गाजी लगा हो या जिसे गाजी की उपाधि दी गयी हो निश्चय हो वह हिन्दुओ का व्यापक नर संहार करके इस्लाम के फैलाव में लगा था। हम हिन्दुओ की सबसे बड़ी कमजोरी है की हम धर्म के बारे में बहुत कम जानते हैं और और अपने को सेकुलर कहते है और सेकुलर का मतलब भी नहीं जानते। एक मुस्लिम अपने को कभी भी सेकुलर नहीं कहता है, चाहे वह नेता हो या आम नागरिक , हां, वह हिन्दू भीड़ में सेकुलर बनने का महत्व का भाषण जरुर देता है।


गजवा-ए-हिन्द का मतलब है की भारत में सभी गैर मुस्लिमो पर इस्लामिक शरिया कानून लागु करना जिसके लिए या तो इनको मारकर ख़तम कर दो या इनको इस्लाम स्वीकार कराओ या उन्हें तब तक जिन्दा रखो जब तक अपनी कमाई का एक हिस्सा “जजिया कर” के रूप में इस्लामिक सरकार को देते रहे जैसा मुग़ल करते रहे। भारत में यह एक बार हो चूका है, हलांकि यह तुकडे तुकडे में हुआ।


गजवा-ए-हिन्द के ७ मुख्य प्रक्रिया स्तर होते हैं


१- अल-तकिय्या :


यह वह अवस्था है जब मुस्लिम कमजोर या कम संख्या में होता है, इस स्थिति में काफिरों (गैर-मुस्लिमों)से झूठ बोलना और उन्हें धोखा देना जायज माना जाता है. यह अवस्था अपने को अंदरूनी तौर से मजबूत रखना और काफिरों से अपनी अंदरूनी जानकारियों से दूर रखना. नेहरुद्दीन जवाहिरी और मैमूना बेगम, राजीव का असली धर्म आज भी किसी को नहीं पता है.


२-काफिरों के मन में भय भरना :


इस काम के लिए काफिरों पर धोखे से हमला करना और उनकी हत्या करना, झुण्ड बनाकर किसी एक जगह पर काफिरों (गैर मुस्लिमों) पर हमले करना, जो पिछले ३-४ साल से भारत में जारी है. ट्रकों और गाड़ियों में भरकर किसी एक जगह पर हिन्दुओं को हड़काना सेकुलर सरकारों में कब से चल रहा है. इस काम के लिए गैर मुस्लिम अगुआ और आक्रामक नेताओं को मौत के घात उतरना, एक-एक करके उनको घात लगाकर खतम कर देना जिसे लोग भयभीत रहा करें और सार्वजनिक रूप से जबान न खोलें.


3 हथियारों का जखीरा इकठ्ठा करना :


यह काम बहुत ही निर्णायक होता है और इसमें धर्म युद्ध जैसे कोई नियम नहीं होते. काफ़िर को जितनी पीड़ा दायक मृत्यु दी जाये (दूसरे काफ़िर को दिखाकर) वह सबसे ज्यादा प्रभावी होता है. हथियार इकठ्ठा करने का काम जो “अदनान खगोशी और उसके बाद बहुत से मुस्लिम तस्कर” पिछले ४० साल से कर रहे हैं. सबसे ज्यादा हथियार सोवियत संघ से मुस्लिम देशों के टूटने के बाद भारत में लाये गए, अनुमान के अनुसार पूर्व सोवियत देशों से १ करोड़ AK-47 गायब हुयीं मगर आज तक उनका कोई पता नहीं है! ये हथियार मुख्यतः भारत-अफगानिस्तान-पाक­िस्तान गए.


4 समय समय पर काफिरों की ताकत का अंदाज़ा करना :


इसके लिए दंगो का सहारा लेकर अपने आक्रमणों का काफिरों की तरफ से प्रतिरोध आंकना जो बहुत दिनों से चल रहा है और इसका ताजा उदाहरण जम्मू के किश्तवाड़ में देखने को मिला. छोटी-छोटी बातों पर बड़ा झगड़ा करके काफिरों की एक जुटता का और उनकी ताकत का पता लगाना.


5 ठिकाने या शिविर बनाना :


इस काम के लिए धर्म का सहारा और दूसरे धर्म पर इस्लाम को सच्चा धर्म बताकर लोगों को आस्थावान बनाकर किया जाता है जिससे लोग मुस्लिमों पर विश्वास करें और उन पर शक न करें. इस इलाके से गैर मुस्लिमों को दूर रखा जाता है जिससे उन्हें गतिविधियों की जानकारी मिल ही न सके और वे गाफिल रहें. इसके लिए बस्तियों और मस्जिदों को इस्तेमाल किया जाता है जहा पर लोगों को इकठ्ठा करना और हथियार रखना और भीड़ को भड़काकर काफिरों का उस इलाक़े में सफाया कर देना. इस्लामिक गतिविधि वाले शिविरों के इलाके से किसी न किसी बहाने सभी काफिरों को भगाना जरुरी होता है जिससे कि कहीं संवेदनशील सूचनाएँ काफिरों को लीक न हो जाएँ क्योंकि इस्लाम की असली ताकत “अल-तकिय्या” ही है.


6 सरकारी सुरक्षा तंत्र को कमजोर करना :


इस काम में तो खुद सरकारें तक शामिल हैं, हर शुक्रवार को नमाज़ के बाद पुलिस की पिटाई उनके मनोबल को तोड़कर पूरे तंत्र को कमजोर करने का हिस्सा है जो जोर-शोर से चल रहा है. असल में सेकुलर सरकारें खुद इस काम को पता नहीं किस वजह से समर्थन दे रही हैं. जिस फौजी के पास १२०० गज कारगर रेंज की असाल्ट रायफल है, वह इन जेहादियों पर गुलेल चला रहा है. इशरत जहाँ और सोहराबुद्दीन केस इसी का भाग है जो इस्लामिक शक्तियों के इशारे पर हो रहे हैं. सेना की संख्या कम रखना, उनके पास साधनों का अभाव, उनके ऊपर क़ानूनी शिकंजा, नौकरी को मजबूरी बनाना, यह इसी का हिस्सा है कि व्यापक दंगे की स्थिति में जिसमें मशीन गन और ग्रेनेड प्रयोग किये जाएँ, सेना का काम सिर्फ कर्फ्यू लगाने तक ही सीमित रहे.


7 व्यापक दंगे :


यह गजवा-ए-हिन्द का अंतिम पड़ाव है जिसमें बहुत कम समय में ज्यादा से ज्यादा काफ़िर या गैर मुस्लिम मर्दों को मौत के घाट उतारना और उनके प्रतिरोध को कम कर देना. गजवा-ए-हिन्द के लिए पाकिस्तान का भारत पर आक्रमण सबसे उपयुक्त समय होगा जो कि पाकिस्तानी वेबसाइटों पर बार-बार देखने को मिलता है. इस काम के लिए जेहादी लड़कों के मरने पर युवा जेहादियों को ७२ सुन्दर जवान हुर्रें मिलने की बात की जाती है और जीत गए तो जवान काफ़िर महिलाओं के साथ सहवास करने के अनंत मौके भी प्रस्तावित किये जाए हैं. यही अंतहीन सिलसिला पिछले १४०० सालों से चल रहा है. पहले भारत में सनातनी जड़ें गहरी थीं जिससे बार-बार सनातनी-हिदूत्व पनप सका लेकिन आज के दिन झूठे इतिहास और गलत पढ़ाई तथा चर्चों और अरबों द्वारा नियंत्रित टीवी / मिडिया ने हिंदुत्व का बेड़ा गर्क कर रखा है उस पर यह हिन्दू विरोधी सरकारें हर वह काम कर रही है जो हिंदुत्व को ख़त्म करने के लिए जरुरी है.


गजवा-ए-हिन्द की यह प्रक्रिया कश्मीर में आज़माई जा चुकी है जो १००% सफल रही है, जम्मू में इसका ट्रायल चल रहा है. बीच में ईसाइयत के खेल ने इसे कमजोर ज़रूर किया था लेकिन अब दोबारा इसने गति पकड़ ली है. भले ही इसमें सबसे बड़ा रोड़ा जानकारी बाँटने के रूप में फेसबुक आ चुका है लेकिन फिर भी तस्करी के हथियार तो आ ही चुके हैं।

One Response

  1. क्या रिसर्च है, मान गये उस्ताद।

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